Thursday, 18 June 2020

बोलने से पहले सोचें




सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप।
 जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।।

• अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति है। और गुस्से में किसी को डाँट देना, अपशब्द कहना या कुछ ऐसा कह देना जो हमें नहीं कहना चाहिए, ये भी स्वाभाविक है। लेकिन जब गुस्सा शाँत होता है तब हमें एहसास होता है कि हमने क्या सही किया और क्या गलत किया। कभी कभी हम गुस्से में हम अपने मित्रो से, अपने परिजनों से या दूसरे लोगो से  इतनी कड़वी बात कह देते हैं कि हमारे मित्र हमसे नाराज हो जाते हैं, बसे बसाये घर उजड़ जाते हैं, बेवजह हम दूसरे लोगो से दुश्मनी मोल ले लेते हैं। हमारे द्वारा कहे गए शब्दों का दूसरों पर क्या असर पड़ता है आइये इस कहानी से समझते हैं।


• एक गाँव में एक किसान रहता था। उसकी अपने पड़ोसी से मित्रता थी। एक बार किसी बात के लेकर किसान का अपने मित्र से झगड़ा हो गया। उसने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, जिससे उसका पड़ोसी नाराज हो गया और उनकी मित्रता टूट गयी। बाद में जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह अपने आप पर बहुत शर्मिंदा हुआ पर अब क्या हो सकता था। शर्म के कारण वह अपने मित्र से माफ़ी भी नहीं माँग सका। परेशान होकर वह एक संत के पास गया। उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।

• संत ने किसान से कहा कि, ”तुम एक थैला भर कर पंख इकठ्ठा कर के लाओ।” किसान ने पंख इकठ्ठे किये और फिर संत के पास पहुंच गया। अब संत ने कहा कि छत पर जाकर इन पंखो को हवा में उड़ा दो।

• किसान ने ऐसा ही किया, थैले से निकाल कर सारे पंख हवा में उड़ गए। अब संत ने फिर कहा कि– अब इन सारे पंखो को दोबारा इकठ्ठा करके लाओ।

• किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे, और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा। और अपनी असमर्थता जताते हुए बोला कि सारे पंख हवा में उड़ गए हैं, वह अब उन्हें दोबारा थैले में इकठ्ठा नहीं कर सकता।

• तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुँह से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।

• दोस्तों, हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। हम गुस्से या झुंझलाहट में कभी कभी ऐसे शब्द कह जाते हैं जिनसे सामने वाला हमसे हमेशा के लिए नाराज हो जाता है। अगर हम उससे माफ़ी माँग भी लें और वो हमें माफ़ कर भी दे तब उसके कानो में वे कड़वे शब्द हमेशा गूंजते रहते हैं और वो चाहकर भी हमारे साथ पहले जैसा व्यव्हार नहीं कर पाता।



• तो दोस्तों आज ही ये बात गाँठ बाँध लीजिये कि किसी को कुछ भी कहने से पहले एक बार जरूर सोचें कि हमारे शब्द क्या हैं चाहे हम किसी से गुस्से में बोल रहे हैं या बिना गुस्से के। ये सोचे कि जो हम बोल रहे हैं हानि अगर वही हमारे लिए बोला जाये तो हमें कैसा महसूस होगा। इसलिए जो कुछ भी बोले अच्छी तरह से सोच समझकर बोलें। अन्यथा बोलें ही नहीं, चुप रहना ही बेहतर है |

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Thursday, 11 June 2020

अविनाशी सतलोक




मुर्दे को जीवित कर सकता है।
और मोक्ष दिला कर सतलोक ले जाते है।

ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।


ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।

▶️ प्रश्न - सतलोक क्या है ❓

▶️ उत्तर - सत यानि कि अविनाशी, लोक यानी कि रहने का स्थान। सतलोक वह स्थान है जिसका कभी नाश नहीं होता। वह अविनाशी है। इसकी रचना कबीर परमात्मा द्वारा की गई है। कबीर परमात्मा समय समय पर अपनी प्यारी आत्माओं को मिलते हैं तथा उन्हें सतलोक दिखाकर वापिस छोड़ जाते हैं। इस कलियुग में जिन जिन को परमात्मा मिले उनके शुभ नाम है आदरणीय गरीबदास साहेब जी, आदरणीय नानक साहिब जी, आदरणीय दादू साहिब जी, आदरणीय धर्मदास साहेब जी।

▶️ प्रश्न - सतलोक कैसा है ❓

▶️ उत्तर - सतलोक स्वप्रकाशित है, वहाँ सभी चीज़े नूर तत्व से बनी हैं। वहाँ दूध, दही की नदियां बहती है। वहाँ हर एक खाद्य पदार्थ मौजूद है। सतलोक में जल अमृत है। वह ऐसा अद्भुत स्थान है जहां कोई भी पदार्थ खराब नही होता तथा जीवो को ना तो कभी बुढ़ापा आता है ना ही मृत्यु होती है। सतलोक सुख सागर है। सतलोक में परमात्मा कबीर जी सत्पुरुष रूप में बहुत बड़े गुम्बज के नीचे विराजमान है। वहां पर उनके एक रोम कूप की शोभा, करोड़ चंद्रमा तथा करोड़ सूरज के प्रकाश से भी ज़्यादा है।

▶️ वहाँ रहने वाले मनुष्यों को हंस कहा जाता है, उनके शरीर का प्रकाश भी 16 सूर्यों जितना है। वहां पर नर नारी की ऐसी ही सृष्टि है लेकिन वहाँ किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है। वहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तथा 3 गुण जीव को दुखी नहीं करते। सतलोक में किसी भी प्रकार का कोई दुख नही है अर्थात उसे सुखमय स्थान भी कहते हैं। वहां पर हर एक जीव का अपना महल है तथा अपना विमान है। वह भी बहुत सुंदर तथा हीरे, पन्नों से जड़े हुए हैं। वहाँ श्वासों से शरीर नही चलता। वहाँ जीव अमर है।

▶️ प्रश्न - सतलोक कहां है ❓

▶️ उत्तर - सतलोक इस काल लोक से 16 संख कोस की दूरी पर ऊपर है। सतलोक के ऊपर 3 लोक और है, अगम लोक,अलख लोक तथा सबसे ऊपर अनामी लोक। इन तीनों लोकों में परमात्मा अपने अलग-अलग रूप में विराजमान है।

▶️ सतलोक में परमात्मा ने सर्वप्रथम 16 द्वीप बनाएं उसके बाद 16 पुत्रों की उत्पत्ति की। इसके बाद अक्षर पुरुष तथा क्षर पुरुष(काल/ ज्योत निरंजन) की उत्पत्ति हुई तथा उसके बाद हम सभी जीवो की उत्पत्ति परमात्मा ने सतलोक में की थी। हम ने वहां पर गलती की थी कि हम परमात्मा कबीर जी जो कि हमारे जनक हैं, उनको छोड़कर काल क्षर पुरुष/ ज्योति निरंजन पर आसक्त हो गए। परमात्मा ने हमसे रुष्ट होकर हमें जोत निरंजन के साथ भेज दिया।

▶️ काल ने 70 युग तक एक पैर पर खड़े होकर तप किया जिसके फलस्वरूप उसे परमात्मा ने उसे 21 ब्रह्मांड दे दिए। दोबारा 70 युग तके तप करने पर परमात्मा ने उसे पांच तत्व और तीन गुण दिए। इतने से भी असंतुष्ट जोत निरंजन ने 64 युग तक तप फिर किया जिसके फलस्वरूप उसने परमात्मा से कुछ आत्माएं उसके ब्रह्मांड में रहने के लिए मांगी। तो परमात्मा ने उसे कहां की जो आत्मा तेरे साथ जाना चाहती हैं वह जा सकती है। जब वह तप करता था तो हम सभी वहां इस पर आसक्त हो गए। जिन भी आत्माओं ने दोनों हाथ उठाकर काल के साथ आने की स्वीकृति दी वह इसके साथ आ गई यहां 21 ब्रह्मांड में 84 लाख योनियों के चक्कर मे पड़ी है।



▶️ प्रश्न - सतलोक कैसे पहुंचेंगे❓

▶️ उत्तर - काल निरंजन ने हम आत्माओं पर कर्म लगा दिए, जिससे वह हमें बहुत दुखी करता है। काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर से निकले गंध को खाने तथा सवा लाख मानव रोज उत्पन्न करने का श्राप लगा है। काल ने हमें यहां अलग अलग धर्मों तथा जातियों में बांट दिया जिससे कि हम आज एक दूसरे के ही दुश्मन बने बैठे हैं। सिर्फ मनुष्य जन्म में ही हम परमात्मा प्राप्ति कर सकते हैं इसलिए मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य भक्ति करना ही बताया गया है।


▶️ यहां से सतलोक वापिस अपने मालिक के पास वापस जाने का सिर्फ एक ही जरिया है, सतगुरु। वर्तमान समय में सिर्फ संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण सतगुरु है जो कि जीव को पूर्ण मोक्ष देने के अधिकारी है। रामपाल जी महाराज ने सर्व धर्म के शास्त्रों से यह प्रमाणित करके बताया है कि कबीर ही परमात्मा है जो कि हम सभी आत्माओं के जनक है इसलिए अब हमें संत रामपाल जी महाराज की शरण में आकर पूर्ण ज्ञान को समझ कर सत्यभक्ति करके वापस सतलोक जाने का प्रयत्न करना चाहिए।

✨ अधिक जानकारी व प्रमाण के लिए देखे साधना टीवी चैनल रात्रि 7:30 से


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Tuesday, 9 June 2020

अंधविश्वास



क्या. आप अंधविश्वासी है?
नही ना !

कोई व्यक्ति अपने आप को अंधविश्वासी स्वीकार नही करना चाहता !

😈सिर्फ झाड़-फूक करवाना, टोना-टोटका प्रथा ही अंधविश्वास नही कहलाता है।

हर वह विश्वास जो आंख बंद करके किया जाय, जिसका कोई वैज्ञानिक और अध्यात्मिक आधार न हो, वह अंधविश्वास कहलाता है।



1. किसी को बांये हाथ से पैसे देना अशुभ
2. किसी व्रत-त्यौहार के खिलाफ बोलना अशुभ
3. किसी के घर में बीमार पड़ जाने पे, लाल मिर्च को आग पर जला के घर में धुवां करना
4. घर दुकान दरवाजे पर /नयी कार आदि पर निम्बू हरी मिर्च टांगना
5. भभूत खाना/खिलाना
6. बच्चों/बड़ो के गले/बाजू में ताबीज पहनना
7. बिल्ली रास्ता काटने पर अशुभ
8. चप्पल उल्टी होने पर अशुभ
9. बाहर जाते समय टोकना अशुभ
10. किसी त्योहार के दिन काले कपडे पहनना अशुभ
11. घर के निर्माण के समय उसकी नीव में ताम्बे/स्वर्ण मुद्रा डालना
12. किसी कार्य के प्रारम्भ में छींकना अशुभ
13. गुरूवार, शनिवार और मंगलवार को दाड़ी/बाल कटवाना अशुभ
14. शनिवार को तेल या तेल में सिक्के का दान करना शुभ
15. बच्चों को नजर लगना
16. चोरी करके घर में बोतल में मनी प्लांट उगना अशुभ
17. पीछे से किसी को नमस्ते आदि करना अशुभ
18. पड़ोस में खाने की वस्तु किसी बर्तन में देने पर खाली बर्तन वापस करना अशुभ
19. विधवा स्त्री का किसी शुभ कार्य में शामिल होना अशुभ
20. कौवें का छत पर बैठ कर बोलना अशुभ
21. रात में कुत्ते का रोना/ अलग प्रकार से भोंकना अशुभ
22. लड़की से वंश न चलना।
23. बच्चों को परीक्षा के लिए दही शक्कर खिलाकर भेजना शुभ
24. गले या बाजु में काला धागा बाँधना।
25. बच्चे को काला टीका लगाना।
26. नदी में सिक्के फेंकना।
27. किसी दिन विशेष किसी खास दिशा की यात्रा न करना।
28. अख़बारों में राशिफल देखना उसके अनुसार कार्यक्रम बनाना।
29. रात में किसी को पैसे उधार देने या लौटाने से परहेज करना।
30. शनिवार को लोहा न खरीदना।
31. विशेष संख्या जैसे 13 को अशुभ मानना।
32. उल्लू पक्षी का दिखना अशुभ
33. छिपकली का ऊपर गिर जाना अशुभ
34. करवा चौथ
35. किसी जाति के व्यक्ति का सुबह-सुबह मुह न देखना अशुभ मानना
36. व्रत आदि रखना
37. कुछ कहते समय बिजली बंद हो जाय तो - झूठ बोल रहा है
38. कुछ कहते समय बिजली आ जाय तो - सच बोल रहा है
39. धनतेरस के दिन यह सोच कर खरीददारी करना की आज धनतेरस है।
40.पति के उम्र के लिऐ पीपल के पेड़ मे रस्सी लपेटना ।
41. वास्तुशास्त्र को मानना एवं उसके अनुसार टोटके या तोड-फोड करना
42. दान कर्म से मेरा भला होगा यह सोच कर दान देना
43. मृत पूर्वज को पानी पिलाना, खाना खिलाना या श्राद्ध कर्म करना
44. विवाह के लिए शुभमुहूर्त निकलवाना
45. जिसके साथ बुरा हुआ है इसका मतलब उसने पूर्व जनम में इस जन्म में बुरा किया होगा ये मानना
46. किन्नरों की दुआ-बद्दुआ पर विश्वास करना
47. झाड़ू खड़ी रखना, या लांघना अशुभ
48. बात करते हुए छींक आना अशुभ मानना
49. शनिवार, मंगलवार को नॉनवेज न खाना
50. भविष्यवाणी, कुंडली दोष, राहु, शनि, केतु, आदि पर विश्वास करना।


😎 यह अंध विश्वास आपके दिमाग मे बहोत बड़ा संघर्ष खड़ा करता है, आप कंफ्यूज ही रहते हो, इसके बारे मे सोचने मे बात या सवाल करने मे भी डरते हो, यह कंफ्यूसन तुम्हारे सारे व्यक्तित्व को मैला कर देती है तुम सफल नही हो पाते यातो संतुष्ट नही हो पाते। जीवन मे किसी भी आनंद का अनुभव नही कर पाते। याद रखें हर पल शुभ है, हर काम, व्यक्ति और दिशाएँ शुभ है। किस्मत या भाग्य केवल मन का वहम है। कर्म और सुबुद्धि ही जीवन का सत्य है।

आगे क्या करना है ?  और क्या नही करना ....!!आप पे छोड़ता हूँ, मेरी बात को भी बिना जांचे परखे, विना तर्क विज्ञान से टटोले अगर सिर्फ मान लिया तो वह भी अंधश्रद्धा ही होगी।इसलिए पहले जानो, तब मानो!बिना डरे सोचें, विचार करें।आपका कल्याण आपकी सोच पर निर्भर है।

अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज के सत्संग साधना टीवी पर शाम 7:30 से

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बोलने से पहले सोचें

सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप।  जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।। • अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति ह...