Thursday, 18 June 2020

बोलने से पहले सोचें




सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप।
 जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।।

• अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति है। और गुस्से में किसी को डाँट देना, अपशब्द कहना या कुछ ऐसा कह देना जो हमें नहीं कहना चाहिए, ये भी स्वाभाविक है। लेकिन जब गुस्सा शाँत होता है तब हमें एहसास होता है कि हमने क्या सही किया और क्या गलत किया। कभी कभी हम गुस्से में हम अपने मित्रो से, अपने परिजनों से या दूसरे लोगो से  इतनी कड़वी बात कह देते हैं कि हमारे मित्र हमसे नाराज हो जाते हैं, बसे बसाये घर उजड़ जाते हैं, बेवजह हम दूसरे लोगो से दुश्मनी मोल ले लेते हैं। हमारे द्वारा कहे गए शब्दों का दूसरों पर क्या असर पड़ता है आइये इस कहानी से समझते हैं।


• एक गाँव में एक किसान रहता था। उसकी अपने पड़ोसी से मित्रता थी। एक बार किसी बात के लेकर किसान का अपने मित्र से झगड़ा हो गया। उसने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, जिससे उसका पड़ोसी नाराज हो गया और उनकी मित्रता टूट गयी। बाद में जब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह अपने आप पर बहुत शर्मिंदा हुआ पर अब क्या हो सकता था। शर्म के कारण वह अपने मित्र से माफ़ी भी नहीं माँग सका। परेशान होकर वह एक संत के पास गया। उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा।

• संत ने किसान से कहा कि, ”तुम एक थैला भर कर पंख इकठ्ठा कर के लाओ।” किसान ने पंख इकठ्ठे किये और फिर संत के पास पहुंच गया। अब संत ने कहा कि छत पर जाकर इन पंखो को हवा में उड़ा दो।

• किसान ने ऐसा ही किया, थैले से निकाल कर सारे पंख हवा में उड़ गए। अब संत ने फिर कहा कि– अब इन सारे पंखो को दोबारा इकठ्ठा करके लाओ।

• किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे, और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा। और अपनी असमर्थता जताते हुए बोला कि सारे पंख हवा में उड़ गए हैं, वह अब उन्हें दोबारा थैले में इकठ्ठा नहीं कर सकता।

• तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है, तुम आसानी से इन्हें अपने मुँह से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते।

• दोस्तों, हमारे साथ भी ऐसा ही होता है। हम गुस्से या झुंझलाहट में कभी कभी ऐसे शब्द कह जाते हैं जिनसे सामने वाला हमसे हमेशा के लिए नाराज हो जाता है। अगर हम उससे माफ़ी माँग भी लें और वो हमें माफ़ कर भी दे तब उसके कानो में वे कड़वे शब्द हमेशा गूंजते रहते हैं और वो चाहकर भी हमारे साथ पहले जैसा व्यव्हार नहीं कर पाता।



• तो दोस्तों आज ही ये बात गाँठ बाँध लीजिये कि किसी को कुछ भी कहने से पहले एक बार जरूर सोचें कि हमारे शब्द क्या हैं चाहे हम किसी से गुस्से में बोल रहे हैं या बिना गुस्से के। ये सोचे कि जो हम बोल रहे हैं हानि अगर वही हमारे लिए बोला जाये तो हमें कैसा महसूस होगा। इसलिए जो कुछ भी बोले अच्छी तरह से सोच समझकर बोलें। अन्यथा बोलें ही नहीं, चुप रहना ही बेहतर है |

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Thursday, 11 June 2020

अविनाशी सतलोक




मुर्दे को जीवित कर सकता है।
और मोक्ष दिला कर सतलोक ले जाते है।

ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।


ऋग्वेद मण्डल 10 सुक्त 161 मंत्र 2, 5, सुक्त 162 मंत्र 5, सुक्त 163 मंत्र 1 - 3 में प्रमाण मिलता है कि पूर्ण परमात्मा आयु बढ़ा सकता है और कोई भी रोग को नष्ट कर सकता है।

▶️ प्रश्न - सतलोक क्या है ❓

▶️ उत्तर - सत यानि कि अविनाशी, लोक यानी कि रहने का स्थान। सतलोक वह स्थान है जिसका कभी नाश नहीं होता। वह अविनाशी है। इसकी रचना कबीर परमात्मा द्वारा की गई है। कबीर परमात्मा समय समय पर अपनी प्यारी आत्माओं को मिलते हैं तथा उन्हें सतलोक दिखाकर वापिस छोड़ जाते हैं। इस कलियुग में जिन जिन को परमात्मा मिले उनके शुभ नाम है आदरणीय गरीबदास साहेब जी, आदरणीय नानक साहिब जी, आदरणीय दादू साहिब जी, आदरणीय धर्मदास साहेब जी।

▶️ प्रश्न - सतलोक कैसा है ❓

▶️ उत्तर - सतलोक स्वप्रकाशित है, वहाँ सभी चीज़े नूर तत्व से बनी हैं। वहाँ दूध, दही की नदियां बहती है। वहाँ हर एक खाद्य पदार्थ मौजूद है। सतलोक में जल अमृत है। वह ऐसा अद्भुत स्थान है जहां कोई भी पदार्थ खराब नही होता तथा जीवो को ना तो कभी बुढ़ापा आता है ना ही मृत्यु होती है। सतलोक सुख सागर है। सतलोक में परमात्मा कबीर जी सत्पुरुष रूप में बहुत बड़े गुम्बज के नीचे विराजमान है। वहां पर उनके एक रोम कूप की शोभा, करोड़ चंद्रमा तथा करोड़ सूरज के प्रकाश से भी ज़्यादा है।

▶️ वहाँ रहने वाले मनुष्यों को हंस कहा जाता है, उनके शरीर का प्रकाश भी 16 सूर्यों जितना है। वहां पर नर नारी की ऐसी ही सृष्टि है लेकिन वहाँ किसी भी चीज़ का अभाव नहीं है। वहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तथा 3 गुण जीव को दुखी नहीं करते। सतलोक में किसी भी प्रकार का कोई दुख नही है अर्थात उसे सुखमय स्थान भी कहते हैं। वहां पर हर एक जीव का अपना महल है तथा अपना विमान है। वह भी बहुत सुंदर तथा हीरे, पन्नों से जड़े हुए हैं। वहाँ श्वासों से शरीर नही चलता। वहाँ जीव अमर है।

▶️ प्रश्न - सतलोक कहां है ❓

▶️ उत्तर - सतलोक इस काल लोक से 16 संख कोस की दूरी पर ऊपर है। सतलोक के ऊपर 3 लोक और है, अगम लोक,अलख लोक तथा सबसे ऊपर अनामी लोक। इन तीनों लोकों में परमात्मा अपने अलग-अलग रूप में विराजमान है।

▶️ सतलोक में परमात्मा ने सर्वप्रथम 16 द्वीप बनाएं उसके बाद 16 पुत्रों की उत्पत्ति की। इसके बाद अक्षर पुरुष तथा क्षर पुरुष(काल/ ज्योत निरंजन) की उत्पत्ति हुई तथा उसके बाद हम सभी जीवो की उत्पत्ति परमात्मा ने सतलोक में की थी। हम ने वहां पर गलती की थी कि हम परमात्मा कबीर जी जो कि हमारे जनक हैं, उनको छोड़कर काल क्षर पुरुष/ ज्योति निरंजन पर आसक्त हो गए। परमात्मा ने हमसे रुष्ट होकर हमें जोत निरंजन के साथ भेज दिया।

▶️ काल ने 70 युग तक एक पैर पर खड़े होकर तप किया जिसके फलस्वरूप उसे परमात्मा ने उसे 21 ब्रह्मांड दे दिए। दोबारा 70 युग तके तप करने पर परमात्मा ने उसे पांच तत्व और तीन गुण दिए। इतने से भी असंतुष्ट जोत निरंजन ने 64 युग तक तप फिर किया जिसके फलस्वरूप उसने परमात्मा से कुछ आत्माएं उसके ब्रह्मांड में रहने के लिए मांगी। तो परमात्मा ने उसे कहां की जो आत्मा तेरे साथ जाना चाहती हैं वह जा सकती है। जब वह तप करता था तो हम सभी वहां इस पर आसक्त हो गए। जिन भी आत्माओं ने दोनों हाथ उठाकर काल के साथ आने की स्वीकृति दी वह इसके साथ आ गई यहां 21 ब्रह्मांड में 84 लाख योनियों के चक्कर मे पड़ी है।



▶️ प्रश्न - सतलोक कैसे पहुंचेंगे❓

▶️ उत्तर - काल निरंजन ने हम आत्माओं पर कर्म लगा दिए, जिससे वह हमें बहुत दुखी करता है। काल को एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर से निकले गंध को खाने तथा सवा लाख मानव रोज उत्पन्न करने का श्राप लगा है। काल ने हमें यहां अलग अलग धर्मों तथा जातियों में बांट दिया जिससे कि हम आज एक दूसरे के ही दुश्मन बने बैठे हैं। सिर्फ मनुष्य जन्म में ही हम परमात्मा प्राप्ति कर सकते हैं इसलिए मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य भक्ति करना ही बताया गया है।


▶️ यहां से सतलोक वापिस अपने मालिक के पास वापस जाने का सिर्फ एक ही जरिया है, सतगुरु। वर्तमान समय में सिर्फ संत रामपाल जी महाराज ही पूर्ण सतगुरु है जो कि जीव को पूर्ण मोक्ष देने के अधिकारी है। रामपाल जी महाराज ने सर्व धर्म के शास्त्रों से यह प्रमाणित करके बताया है कि कबीर ही परमात्मा है जो कि हम सभी आत्माओं के जनक है इसलिए अब हमें संत रामपाल जी महाराज की शरण में आकर पूर्ण ज्ञान को समझ कर सत्यभक्ति करके वापस सतलोक जाने का प्रयत्न करना चाहिए।

✨ अधिक जानकारी व प्रमाण के लिए देखे साधना टीवी चैनल रात्रि 7:30 से


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Tuesday, 9 June 2020

अंधविश्वास



क्या. आप अंधविश्वासी है?
नही ना !

कोई व्यक्ति अपने आप को अंधविश्वासी स्वीकार नही करना चाहता !

😈सिर्फ झाड़-फूक करवाना, टोना-टोटका प्रथा ही अंधविश्वास नही कहलाता है।

हर वह विश्वास जो आंख बंद करके किया जाय, जिसका कोई वैज्ञानिक और अध्यात्मिक आधार न हो, वह अंधविश्वास कहलाता है।



1. किसी को बांये हाथ से पैसे देना अशुभ
2. किसी व्रत-त्यौहार के खिलाफ बोलना अशुभ
3. किसी के घर में बीमार पड़ जाने पे, लाल मिर्च को आग पर जला के घर में धुवां करना
4. घर दुकान दरवाजे पर /नयी कार आदि पर निम्बू हरी मिर्च टांगना
5. भभूत खाना/खिलाना
6. बच्चों/बड़ो के गले/बाजू में ताबीज पहनना
7. बिल्ली रास्ता काटने पर अशुभ
8. चप्पल उल्टी होने पर अशुभ
9. बाहर जाते समय टोकना अशुभ
10. किसी त्योहार के दिन काले कपडे पहनना अशुभ
11. घर के निर्माण के समय उसकी नीव में ताम्बे/स्वर्ण मुद्रा डालना
12. किसी कार्य के प्रारम्भ में छींकना अशुभ
13. गुरूवार, शनिवार और मंगलवार को दाड़ी/बाल कटवाना अशुभ
14. शनिवार को तेल या तेल में सिक्के का दान करना शुभ
15. बच्चों को नजर लगना
16. चोरी करके घर में बोतल में मनी प्लांट उगना अशुभ
17. पीछे से किसी को नमस्ते आदि करना अशुभ
18. पड़ोस में खाने की वस्तु किसी बर्तन में देने पर खाली बर्तन वापस करना अशुभ
19. विधवा स्त्री का किसी शुभ कार्य में शामिल होना अशुभ
20. कौवें का छत पर बैठ कर बोलना अशुभ
21. रात में कुत्ते का रोना/ अलग प्रकार से भोंकना अशुभ
22. लड़की से वंश न चलना।
23. बच्चों को परीक्षा के लिए दही शक्कर खिलाकर भेजना शुभ
24. गले या बाजु में काला धागा बाँधना।
25. बच्चे को काला टीका लगाना।
26. नदी में सिक्के फेंकना।
27. किसी दिन विशेष किसी खास दिशा की यात्रा न करना।
28. अख़बारों में राशिफल देखना उसके अनुसार कार्यक्रम बनाना।
29. रात में किसी को पैसे उधार देने या लौटाने से परहेज करना।
30. शनिवार को लोहा न खरीदना।
31. विशेष संख्या जैसे 13 को अशुभ मानना।
32. उल्लू पक्षी का दिखना अशुभ
33. छिपकली का ऊपर गिर जाना अशुभ
34. करवा चौथ
35. किसी जाति के व्यक्ति का सुबह-सुबह मुह न देखना अशुभ मानना
36. व्रत आदि रखना
37. कुछ कहते समय बिजली बंद हो जाय तो - झूठ बोल रहा है
38. कुछ कहते समय बिजली आ जाय तो - सच बोल रहा है
39. धनतेरस के दिन यह सोच कर खरीददारी करना की आज धनतेरस है।
40.पति के उम्र के लिऐ पीपल के पेड़ मे रस्सी लपेटना ।
41. वास्तुशास्त्र को मानना एवं उसके अनुसार टोटके या तोड-फोड करना
42. दान कर्म से मेरा भला होगा यह सोच कर दान देना
43. मृत पूर्वज को पानी पिलाना, खाना खिलाना या श्राद्ध कर्म करना
44. विवाह के लिए शुभमुहूर्त निकलवाना
45. जिसके साथ बुरा हुआ है इसका मतलब उसने पूर्व जनम में इस जन्म में बुरा किया होगा ये मानना
46. किन्नरों की दुआ-बद्दुआ पर विश्वास करना
47. झाड़ू खड़ी रखना, या लांघना अशुभ
48. बात करते हुए छींक आना अशुभ मानना
49. शनिवार, मंगलवार को नॉनवेज न खाना
50. भविष्यवाणी, कुंडली दोष, राहु, शनि, केतु, आदि पर विश्वास करना।


😎 यह अंध विश्वास आपके दिमाग मे बहोत बड़ा संघर्ष खड़ा करता है, आप कंफ्यूज ही रहते हो, इसके बारे मे सोचने मे बात या सवाल करने मे भी डरते हो, यह कंफ्यूसन तुम्हारे सारे व्यक्तित्व को मैला कर देती है तुम सफल नही हो पाते यातो संतुष्ट नही हो पाते। जीवन मे किसी भी आनंद का अनुभव नही कर पाते। याद रखें हर पल शुभ है, हर काम, व्यक्ति और दिशाएँ शुभ है। किस्मत या भाग्य केवल मन का वहम है। कर्म और सुबुद्धि ही जीवन का सत्य है।

आगे क्या करना है ?  और क्या नही करना ....!!आप पे छोड़ता हूँ, मेरी बात को भी बिना जांचे परखे, विना तर्क विज्ञान से टटोले अगर सिर्फ मान लिया तो वह भी अंधश्रद्धा ही होगी।इसलिए पहले जानो, तब मानो!बिना डरे सोचें, विचार करें।आपका कल्याण आपकी सोच पर निर्भर है।

अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज के सत्संग साधना टीवी पर शाम 7:30 से

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Saturday, 23 May 2020

प्रभु पे विश्वास

     ‘‘संगत का प्रभाव तथा विश्वास प्रभु का’’

एक गाँव में एक व्यक्ति के विवाह को दस-बारह वर्ष हो चुके थे। संतान नहींहुई थी। उसी गाँव से बाहर लगभग दो कि.मी. की दूरी पर एक आश्रम था। उसमेंएक सिद्ध संत रहता था। वह गाँव में से भिक्षा माँगकर लाता था। उसको तीन-चारया अधिक दिन खाता रहता था। एक दिन वह उस घर से भिक्षा लेने गया जिसव्यक्ति को कोई संतान नहीं थी। स्त्रा-पुरूष दोनों ने साधु जी से पुत्रा प्राप्ति के लिएचरण पकड़कर प्रार्थना की। साधु ने कहा कि एक शर्त पर संतान हो सकती है।स्त्रा-पुरूष ने पूछा कि बताओ। साधु ने कहा कि प्रथम पुत्रा उत्पन्न होगा। दो वर्षहोने के पश्चात् मुझे चढ़ाना होगा। उसे मैं अपना उत्तराधिकारी बनाऊँगा। आपकोमंजूर हो तो बताओ। उसके पश्चात् लड़की होगी। फिर एक पुत्रा होगा। दोनों नेउस शर्त को स्वीकार कर लिया। साधु के आशीर्वाद से दसवें महीने पुत्रा हुआ। दोवर्ष का होने पर साधु को सौंप दिया। उस समय स्त्रा फिर गर्भवती थी। उसनेकन्या को जन्म दिया। फिर एक पुत्रा और हुआ। जिस कारण से साधु की महिमाऔर अधिक हो गई। उस आश्रम में युवा लड़कियों का प्रवेश निषेध था। जब वहलड़का सोलह वर्ष का हुआ तो एक दिन गुरू जी को छाती में स्तन के पास फोड़ाहो गया। जिस कारण साधु जी दर्द के कारण व्याकुल रहने लगा। जड़ी-बूटीबनाकर उस फोड़े पर लगाई। चार-पाँच दिन में वह फोड़ा फूटकर ठीक हुआ। तबसाधु सामान्य हुआ। कुछ दिन के पश्चात् साधु को बुखार हो गया। वृद्धावस्था वबुखार के कारण उत्पन्न कमजोरी की वजह से चलने-फिरने में असमर्थ हो गया।साधु ने उस शिष्य को कभी गाँव में भिक्षा लेने नहीं भेजा था। यह विचार करकेकि कहीं जवान लड़का गाँव में लड़कों के साथ बैठकर बुरी संगत में पड़कर कोईगलती न कर दे।कहीं विवाह करने की प्रेरणा न हो जाए। परंतु उस दिन विवश होकर साधुने अपने शिष्य से कहा कि बेटा! भिक्षा माँगकर ला और गाँव में प्रथम गली में चौथेघर से जो मिले, उसे लेकर आ जाना, आगे मत जाना। लड़का गुरूजी केआदेशानुसार उसी घर के द्वार पर गया और बोला, अलख निरंजन! उस घर सेएक 14 वर्षीय लड़की भिक्षा डालने के लिए द्वार पर आई तो साधु लड़का उसलड़की की छाती की ओर गौर से देख रहा था। लड़की ने देख लिया कि साधु कीदृष्टि में दोष है। लड़की बोली कि ले बाबा भिक्षा। साधु बोला, हे माई की बेटी!तेरी छाती पर दो फोड़े हुए हैं। आप आश्रम में आ जाना। तेरे फोड़े गुरू जी ठीककर देंगे। हे माई की बेटी! आपको बहुत पीड़ा हो रही होगी। मेरे गुरू जी को तोएक ही फोड़े ने दुःखी कर रखा था। यह बात लड़के साधु से सुनकर लड़की काअंदाजा और दृढ़ हो गया कि यह साधु नेक नहीं है। लड़की ऊँची-ऊँची आवाज मेंबोलने लगी कि अपनी माँ-बहन के फोड़े ठीक करा ले, बदतमीज! तेरे को जूतीमारूंगी। यह कहकर लड़की ने पैर की जूती निकाल ली और बोली चला जा यहाँसे, फिर कभी मत आना। शोर सुनकर लड़की की माता भी द्वार पर आई और पूछाकि बेटी! क्या बात है? लड़की ने उस साधु की करतूत माता को बताई। माता नेपूछा कि बाबा जी! कहाँ से आये हो? लड़के साधु ने बताया कि इस आश्रम से आयाहूँ। मेरे गुरू जी बीमार हो गए हैं, चलने-फिरने में असमर्थ हैं। इसलिए पहली बारमुझे भिक्षा लाने भेजा है। मैं उनका शिष्य हूँ। मैंने तो इस बहन से पूछा था कितेरी छाती पर दो फोड़े हैं, बहुत दुःखी हो रही होगी। मेरे गुरू जी को तो एक हीफोड़ा हुआ था, दिन-रात दर्द से व्याकुल रहते थे। वे औषधि जानते हैं। आप गुरूजी के पास जाकर फोड़े ठीक करा लो। वह साधु लड़का उसी स्त्रा का बेटा थाजो साधु को चढ़ा रखा था। वह लड़की उस साधु बाबा की छोटी बहन थी। माताने बताया कि यह तेरा भाई है जो हमने साधु को चढ़ा रखा है। यह दुनियादारीकी खराब बातों से बचा है। इसको कुछ भी पता नहीं है। जो दोष बेटी तुझे लगा,वह इस तेरे भाई में नहीं है। यह तो पाक-साफ आत्मा से बोल रहा था। तूने गाँवके चंचल युवकों वाली शरारत के अनुसार विचार करके धमकाया। माई ने बतायाकि साधु जी! मेरी बेटी की छाती पर फोड़े नहीं हैं। ये दूधी हैं, देख! जैसे मेरी छातीपर हैं। इसका विवाह करेंगे। इसको संतान उत्पन्न होगी। तब इन दूधियों से इससेबच्चे दूध पीऐंगे। साधु बच्चा बोला, हे माई! इसका विवाह कब होगा? कब इसकोसंतान होगी? माई ने बताया कि कभी तीन-चार वर्ष के पश्चात् विवाह करेंगे। फिरदो-तीन वर्ष पश्चात् संतान होगी।साधु लड़के ने आध्यात्मिक दृष्टिकोण से विचार किया कि परमात्मा को जन्मलेने वाले बच्चे की कितनी चिंता है। उसके जन्म से 7.8 वर्ष पूर्व ही दूध पीने कीव्यवस्था कर रखी है। क्या वह हमारे खाने की व्यवस्था आश्रम में नहीं करेगा? हमतो गुरू-शिष्य उस परमात्मा के भरोसे बैठे हैं। आज के बाद भिक्षा माँगना बंद। यहविचार कर रहा था कि माई ने पूछा, बाबा जी! क्या चिंता कर रहे हो? साधु बोलाकि माई चिंता समाप्त। यह कहकर भिक्षा सहित झोली (थैला) गली में फैंककरआश्रम खाली हाथ आया तो गुरू जी ने पूछा कि भिक्षा क्यों नहीं लाया? झोलीकिसी ने छीन ली क्या? लड़के ने बताया कि गुरू जी! जब परमात्मा बच्चे के जन्मलेने से 7.8 वर्ष पूर्व ही सर्व खाने की व्यवस्था करता है तो क्या अपनी आश्रम मेंनहीं करेगा? अवश्य करेगा। इसलिए मैं झोली गली में फैंक आया। साधु समझ गयाकि यह कामचोर रास्ते में झोली फैंककर आ गया कि रोज भिक्षा लेने जाना पड़ेगा।साधु विवश था, कुछ नहीं बोला। सोचा कि कल मैं दुःखी-सुखी होकर जैसे-तैसेस्वयं भिक्षा लाऊँगा।जब साधु बालक झोली तथा भिक्षा गली में फैंककर आश्रम में चला गया तोपरमात्मा ने नगर के कुछ व्यक्तियों में प्रेरणा की कि बड़े बाबा अस्वस्थ हैं। छोटेबाबा को किसी ने कुछ कह दिया, वह भिक्षा व झोली दोनों फैंककर चला गया।साधु भूखा है, बच्चा भी भूखा रहेगा। यह विचार करके अच्छा भोजन तैयार किया।खीर-फुल्के-दाल बनाकर पहले एक लेकर पहुँचा और साधु से कहा कि छोटा बाबाजी किसी के कहने पर रूष्ट होकर भिक्षा नहीं लाया। झोली-भिक्षा फैंक आया। आपभोजन खाओ। साधु ने कहा कि पहले बालक को खिलाओ। बालक बोला कि पहलेगुरू जी खाऐंगे, फिर चेला खाएगा। साधु भोजन खाने लगा। इतने में दूसराहलवा-पूरी-छोले लेकर आ गया। इस प्रकार लगभग दस व्यक्ति गाँव के यही विचारकरके भोजन लेकर आश्रम में पहुँचे। चेला बोला कि वाह भगवान! हमें पता नहींथा कि आप कितने अच्छे हो। इसीलिए आपके नाम की चिंता कम भोजन कीअधिक रहती थी। गाँव वालों ने नम्बर बाँध लिया कि एक दिन एक घर से साधुओंका भोजन भेजा जाए। ऐसा ही हुआ।शिक्षा :- जैसी संगत, वैसी रंगत। अपना दोष दूसरे में दिखता है। परमात्मापर विश्वास बिना भक्त अधूरा है। माँगकर खाना भी शास्त्राविरूद्ध है क्योंकि यदिभक्त की श्रद्धा तथा भावना सच्ची है तो परमात्मा व्यवस्था कर देता है। परंतुगृहस्थी के कर्म करके भोजन ग्रहण करना सर्वोत्तम है। साधु-संत का कर्म सत्संगकरना, भक्ति करना है। यदि सच्ची श्रद्धा से करता है तो उसे माँगने कीआवश्यकता नहीं पड़ेगी।

https://youtu.be/qF9JOKeAeHc
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Monday, 18 May 2020

कबीर अल्लह




🌿अल्लाह/प्रभु ने हम मनुष्यों के खाने के लिए फलदार वृक्ष तथा बीजदार पौधे दिए हैं, मांस खाने का आदेश नहीं दिया।
🌿एक तरफ तो आप भक्ति करते हो, और दूसरी तरफ आप बेजुबान निर्दोष जानवरों की हत्या कर उनका मांस खाते हो। सभी जीव परमात्मा की प्यारी आत्मा है, तो फिर मांस खाने से परमात्मा प्राप्ति कैसे होगी?
🌿 जीव हिंसा करे,प्रकट पाप सिर होय।निगम पुनि ऐसे पाप ते, भिस्त गया ना कोय।
परमात्मा कबीर जी कहते हैं कि जीव हिंसा करने से पाप ही लगता है। ऐसा महापाप करके भिस्त (स्वर्ग) कोई नहीं गया। तो फिर हे भोले मानव फिर ऐसा महापाप क्यों करता है।
🌿मांस मछलियां खात है, सुरापान से हेत। ते नर नरकै जाएंगे, मात पिता समेत।।
परमेश्वर कबीर जी कहते हैं की जो  जीव हत्या करता है,मांस खाते हैं, वह अपराधी आत्मा मृत्यु उपरांत नरक में जाएंगे, साथ ही मात-पिता भी नरक में जाएंगे।
🌿 कबीर, तिलभर मछली खायके, कोटि गऊ दे दान। काशी करौंत ले मरे, तो भी नरक निदान।।
तिल के समान भी मछली खाने वाले चाहे करोड़ो गाय दान कर लें, चाहे काशी कारोंत में सिर कटा ले वे नरक में अवश्य जाएंगे।
🌿 आज़ का मानव समाज मांस खाकर महापाप का भागी बन रहा है।
🌿कभी सोचा है कि, अगर मांस खाने से परमात्मा प्राप्ति होती, तो सबसे पहले मांसाहारी जानवरों को होती, जो केवल मांस ही खाते हैं।
मांस खाकर आप परमात्मा के बनाएं विधान को तोड़कर परमात्मा के दोषी बन रहे हो। ऐसा करने वाले को नरक में डाला जाता है।
🌿गरीब, जीव हिंसा जो करते हैं, या आगे क्या पाप। कंटक जुनी जिहान में, सिंह भेड़िया और सांप।।
जो जीव हिंसा करते हैं उससे बड़ा पाप नहीं है। जीव हत्या करने वाले वे करोड़ों जन्म शेर, भेड़िया और साँप के पाते हैं।
🌿कबीर-माँस भखै औ मद पिये, धन वेश्या सों खाय।
जुआ खेलि चोरी करै, अंत समूला जाय।।
जो व्यक्ति माँस भक्षण करते हैं, शराब पीते हैं, वैश्यावृति करते हैं। जुआ खेलते हैं तथा चोरी करते हैं वह तो महापाप के भागी हैं। जो व्यक्ति माँस खाते हैं वे नरक के भागी हैं।
🌿कबीर परमात्मा कहते हैं माँस तो कुत्ते का आहार है, मनुष्य शरीर धारी के लिए वर्जित है।
कबीर-यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय।
मुखमें आमिख मेलिके, नरक परंगे जाय।।
🌿परमात्मा ने इंसान तो क्या जानवरों को भी मांस खाने की इजाजत नहीं दी। सबके खाने के लिए फल, सब्जियां, अनाज, और पेड़ पौधे बनाये हैं।
🌿हज़रत मुहम्मद जी जैसी इबादत आज का कोई मुसलमान नहीं कर सकता। उन्होंने मरी हुई गाय को अपनी शब्द शक्ति से जीवित किया था, कभी मांस नहीं खाया।
जबकि आज सर्व मुस्लिम समाज मांस खा रहा है, जो अल्लाह का आदेश नहीं है।
🌿तीसों रोज़े भी रखते हो और वहीं क़त्ल भी करते हो।
तुम्हें अल्लाह का दीदार कैसे होगा।
🌿जो व्यक्ति मांस खाते हैं, महापाप के भागी हैं, वे घोर नरक में गिरेंगे।
जो व्यक्ति जीव हत्या करते हैं जैसे गाय, बकरी, मुर्गी, सुअर आदि की वह महापापी हैं।
मांस खा कर यदि आप बलिदान भी देते हो तो सब व्यर्थ है, उसका कोई लाभ नहीं।
मांस को बैन कर देना चाहिए।
🌿वर्तमान में सर्व मुसलमान श्रद्धालु माँस खा रहे हैं। परन्तु नबी मुहम्मद जी ने कभी माँस नहीं खाया तथा न ही उनके सीधे अनुयाईयों (एक लाख अस्सी हजार) ने माँस खाया।
केवल रोजा व बंग तथा नमाज किया करते थे। गाय आदि को बिस्मिल(हत्या) नहीं करते थे।
नबी मुहम्मद नमस्कार है, राम रसूल कहाया।
एक लाख अस्सी कूं सौगंध, जिन नहीं करद चलाया।।
🌿कबीर, दिनको रोजा रहत हैं, रात हनत हैं गाय।
यह खून वह वंदगी, कहुं क्यों खुशी खुदाय।।
परमात्मा कबीर जी कहते हैं कि मुस्लिम दिन में तो रोजा रखते हैं और रात में गाय का मांस खाते हैं। यह जीव हत्या है, यह अल्लाह की बन्दगी नहीं है। फिर अल्लाह इससे खुश क्यों होगा?
🌿गला काटै कलमा भरै, किया करै हलाल।
साहिब लेखा मांगसी तब होगा कौन हवाल।।
परमात्मा कबीर ने कलमा पढ़कर जीवों की हत्या करने वाले मुल्ला काज़ियों को लताड़ते हुए कहा है कि जिन निर्दोष जीवों की हत्या तुम कर रहे हो इन सभी पापों का लेखा जोखा अल्लाह तुमसे जरूर लेंगे। तब कोई बचाने वाला नहीं होगा।
अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें संत रामपाल जी महाराज के सत्संग साधना टीवी पर शाम 7:30 से http://www.supremegod.org

Monday, 4 May 2020

बेटी की विदाई





बेटी आँगन का फूल


हर लडकी के लिए प्रेरक कहानी...
और लड़कों के लिए अनुकरणीय शिक्षा...,

कोई भी लडकी की सुदंरता उसके चेहरे से ज्यादा दिल की होती है।
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अशोक भाई ने घर मेँ पैर रखा....‘अरी सुनती हो !'

आवाज सुनते ही अशोक भाई की पत्नी हाथ मेँ पानी का गिलास लेकर बाहर आयी और बोली

"अपनी beti का रिश्ता आया है,

अच्छा भला इज्जतदार सुखी परिवार है,
लडके का नाम युवराज है ।
बैँक मे काम करता है।
बस beti  हाँ कह दे तो सगाई कर देते है."

Beti उनकी एकमात्र लडकी थी..

घर मेँ हमेशा आनंद का वातावरण रहता था ।

कभी कभार अशोक भाई सिगरेट व पान मसाले के कारण उनकी पत्नी और beti के साथ कहा सुनी हो जाती लेकिन
अशोक भाई मजाक मेँ निकाल देते ।

Beti खूब समझदार और संस्कारी थी ।

S.S.C पास करके टयुशन, सिलाई काम करके पिता की मदद करने की कोशिश करती ।

अब तो beti ग्रज्येएट हो गई थी और नोकरी भी करती थी
लेकिन अशोक भाई उसकी पगार मेँ से एक रुपया भी नही लेते थे...

और रोज कहते ‘बेटी यह पगार तेरे पास रख तेरे भविष्य मेँ तेरे काम आयेगी ।'

दोनो घरो की सहमति से beti  और
युवराज की सगाई कर दी गई और शादी का मुहूर्त भी निकलवा दिया.

अब शादी के 15 दिन और बाकी थे.

अशोक भाई ने beti को पास मेँ बिठाया और कहा-

" बेटा तेरे ससुर से मेरी बात हुई...उन्होने कहा दहेज मेँ कुछ नही लेँगे, ना रुपये, ना गहने और ना ही कोई चीज ।

तो बेटा तेरे शादी के लिए मेँने कुछ रुपये जमा किए है।

यह दो लाख रुपये मैँ तुझे देता हूँ।.. तेरे भविष्य मेँ काम आयेगे, तू तेरे खाते मे जमा करवा देना.'

"OK PAPA" - beti ने छोटा सा जवाब देकर अपने रुम मेँ चली गई.

समय को जाते कहाँ देर लगती है ?

शुभ दिन बारात आंगन में आयी,

पंडितजी ने चंवरी मेँ विवाह विधि शुरु की।
फेरे फिरने का समय आया....

कोयल जैसे कुहुकी हो ऐसे beti दो शब्दो मेँ बोली

"रुको पडिण्त जी ।
मुझे आप सब की उपस्तिथि मेँ मेरे पापा के साथ बात करनी है,"

“पापा आप ने मुझे लाड प्यार से बडा किया, पढाया, लिखाया खूब प्रेम दिया इसका कर्ज तो चुका सकती नही...

लेकिन युवराज और मेरे ससुर जी की सहमति से आपने दिया दो लाख रुपये का चेक मैँ वापस देती हूँ।

इन रुपयों से मेरी शादी के लिए लिये हुए उधार वापस दे देना
और दूसरा चेक तीन लाख जो मेने अपनी पगार मेँ से बचत की है...

जब आप रिटायर होगेँ तब आपके काम आयेगेँ,
मैँ नही चाहती कि आप को बुढापे मेँ आपको किसी के आगे हाथ फैलाना पडे !

अगर मैँ आपका लडका होता तब भी इतना तो करता ना ? !!! "

वहाँ पर सभी की नजर beti  पर थी...

“पापा अब मैं आपसे जो दहेज मेँ मांगू वो दोगे ?"

अशोक भाई भारी आवाज मेँ -"हां बेटा", इतना ही बोल सके ।

"तो पापा मुझे वचन दो"
आज के बाद सिगरेट के हाथ नही लगाओगे....

तबांकु, पान-मसाले का व्यसन आज से छोड दोगे।

सब की मोजुदगी मेँ दहेज मेँ बस इतना ही मांगती हूँ ।."

लडकी का बाप मना कैसे करता ?

शादी मे लडकी की विदाई समय कन्या पक्ष को रोते देखा होगा लेकिन

आज तो बारातियो कि आँखो मेँ आँसुओ कि धारा निकल चुकी थी।

मैँ दूर se us beti को लक्ष्मी रुप मे देख रहा था....

रुपये का लिफाफा मैं अपनी जेब से नही निकाल पा रहा था....

साक्षात लक्ष्मी को मैं कैसे लक्ष्मी दूं ??

लेकिन एक सवाल मेरे मन मेँ जरुर उठा,

“भ्रूण हत्या करने वाले लोगो को is जैसी लक्ष्मी मिलेगी क्या" ???

कृपया रोईए नही, आंसू पोछिए और प्रेरणा लीजिये।
Please save girls....
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Must read this book..


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बोलने से पहले सोचें

सांच बराबर तप नहीं ,झूठ बराबर पाप।  जाके हिरदे सांच है, ताके हिरदे आप।। • अक्सर छोटी छोटी बातों पर गुस्सा करना मनुष्य की प्रवृति ह...